छन्द - दोहे

मो सम दीन न दीन हित, तुम मान रघुवीर ।

अस बिचारि रघुवंशमणि, हरहु विषम भव भीर ॥

बार बार वर मांगहूँ हरषि देहु श्रीरंग ।

पद सरोज अनपायिनी, भगति सदा सत्सँग ॥

जासु नाम भव भेषज, हरन घोर त्रयसूल ।

सो कृपालु मोहिं तोहिं पर, सदा रहहु अनुकूल ॥

 

 

पाई न केहि गति पतित पावन, राम भजि सुनु सठ मना।

गनिका अजामिल व्याध गीध, गजादि खल तारे घना |

आभीर जमन किरात खस, श्वपचादि अति अध रूप जे ।

कहि नाम बारेक तेपि पावन, होहिं राम नमामि ते ॥

रघुवंश भूषण चरित यह, नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं

कलिमल मनोमल धोई, बिनु श्रम राम धाम सिधाबहीं

सत पंच चौपाई मनोहर जानि जे नर उर धरैं

दारुन अविद्या पञ्च जनित, विकार श्री रघुवर हरैं

सुन्दर सुजान कृपा निधान, अनाथ पर कर प्रीति जो

सो एक राम अकाम हित, निर्वानप्रद सम आन को

जाकी कृपा लवलेश ते, मतिमन्द तुलसीदास हूँ ।

पायो परम विश्राम राम, समान प्रभु नाहीं कहूं।


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